Mangal maha shivaratri 2018 2018 pooja vidhi

मंगल महाशिवरात्रि पूजा विधि

शिव भक्तों का सबसे बड़ा त्योहार महाशिवरात्रि माना जाता है। इस उत्सव को भक्त पूरे वर्ष इंतजार करते हैं, इस बार दो दिन उपवास का अवसर प्राप्त हो गया है। और चतुर्दशी की तारीख 13 वें और 14 फरवरी को हो रही है। ग्रंथों के अनुसार, त्रिदशी और चतुर्दशी के दिन, महाशिवरात्रि का उपवास होना चाहिए। यह 13 फरवरी को हो रहा है।

महा शिवरात्रि मुहूर्त-

  1. इस दिन शिवरात्रि पूजा का समय 24:09+ से 25:01 तक होगा। मुहूर्त की अवधि कुल 51 मिनट की है।
  2. 14th तारीख, को महा शिवरात्रि पारण का समय 07:04 से 15:20 तक होगा।
  3. (1)रात्रि पहले प्रहर पूजा का समय = 18:05 से 21:20
    (2)रात के दूसरा प्रहर में पूजा का समय = 21:20 से 24:35,
    (3)रात्रि तीसरा प्रहर पूजा का समय = 24:35 से 27:49,
    (4)रात्रि चौथा प्रहर पूजा का समय = 27:49 से 31:04,
  4. चतुर्दशी तिथि 13 फरवरी 2018, मंगवलार 22:36 से प्रारंभ होगी जो 15 फरवरी 2018, 00:48 बजे खत्म होगी।

महाशिवरात्रि व्रत विधि-

महाशिवरात्रि की उपवास रखने की परंपरा लंबे समय से चल रही है, भक्त उपवास के दिन सुबह जागते हैं और शिव मंदिर जाते हैं, भगवान शिव की भगवान की मूर्ति पूजा करते हैं। , ताकि भगवान शिव की कृपा हमेशा उस पर रहेगा ।

  1. गरुड़ पुराण के अनुसार भक्त शिवरात्रि के एक दिन पहले पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं। और इसके बाद, चतुर्दशी तिथि को पूरा दिन भूखा रहकर व्रत रखते हैं और भगवान की पूजा करते हैं। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव को गंगा जल चढ़ाने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।
  2. महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग को पंचामृत से स्नान कराकर ‘ॐ नमः शिवायः’ मंत्र से पूजा करनी चाहिए। इसके बाद रात्रि के चारों प्रहर में शिवजी की पूजा करनी चाहिए और अगले दिन प्रातःकाल ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिए।
  3.  गरुड़ पुराण के अनुसार इस दिन भगवान शिव को बिल्व पत्र के साथ सफेद आंकड़े के फूल अर्पित करना चाहिए। भगवान शिव को बिल्व पत्र व सफेद आंकड़े के फूल बेहद प्रिय हैं। शिव को रुद्राक्ष, बिल्व पत्र, भांग, शिवलिंग और काशी अतिप्रिय हैं।
  4. इस दिन महानिशिथकाल में महामृत्युंजय का जाप करने से रोग-शोक से राहत मिलती है। कोई भी व्रत पूर्ण श्रद्धा रखकर किया जाए तभी सफल होता है।

महाशिवरात्रि व्रत पर यह शुभ संयोग-

  1. 12 तारीख की मध्यरात्रि के बाद सूर्य संक्रांति हो रही है। सूर्य मकर से कुंभ राशि में पहुंचेंगे। इससे 13 तारीख को संक्रांति का पुण्यकाल रहेगा। 13 फरवरी को महाशिवरात्रि का व्रत करेंगे उन्हें एक साथ कई व्रतों का पुण्य प्राप्त होगा।
  2.  13 फरवरी को महाशिवरात्रि व्रत करने से व्रत का भी पुण्य प्राप्त होगा और मंगलवार के व्रत का भी। यानी शिव के साथ हनुमान जी की भी कृपा प्राप्त होगी। इसके साथ ही पूरे दिन त्रयोदशी तिथि है और रात 11 बजकर 35 मिनट पर चतुर्दशी तिथि है। मंगल और त्रयोदशी के संयोग से भौम प्रदोष व्रत का संयोग बना हुआ है। यह व्रत आरोग्य और संतान सुख प्रदान करने वाला माना गया है।
  3.  इस दिन सिद्धि योग बना हुआ है। यानी जिस भी मनोरथ से शिव की पूजा करेंगे उससे वह सिद्ध होगा। इस दिन कोई भी शुभ कार्य करना सफलता दिलाने वाला रहेगा।

महाशिवरात्रि व्रत कथा –

प्राचीन काल में, एक जंगल में गुरुद्रुह नाम का एक शिकारी रहता था जो जंगली जानवरों का शिकार करके अपने परिवार का भरण-पोषण किया करता था। एक बार शिवरात्रि के दिन वह शिकार के लिए निकला लेकिन पूरा दिन व्यतीत हो जाने के उपरांत भी उसे कोई शिकार नहीं मिला।

इस बात से वह चिंतित हो गया कि आज उसके बच्चों, पत्नी एवं माता-पिता को भूखा रहना पड़ेगा। सूर्यास्त होने पर वह एक जलाशय के समीप गया और वहां एक घाट के किनारे से थोड़ा सा जल पीने के लिए लेकर पास के एक पेड़ पर चढ़ गया। उसे पूरी उम्मीद थी कि कोई न कोई जानवर अपनी प्यास बुझाने के लिए यहां जरूर आएगा। संयोगवश वह पेड़ बेल-पत्र का था और उसी पेड़ के नीचे शिवलिंग भी था जो सूखे बेलपत्रों से ढके होने के कारण दिखाई नहीं दे रहा था।

रात का पहला प्रहर बीतने से पूर्व एक हिरणी वहां पानी पीने के लिए आई। उस पर निशाना साधने के दौरान उसके हाथ के धक्के से कुछ पत्ते एवं जल की कुछ बूंदें नीचे बने शिवलिंग पर गिरीं और अनजाने में ही शिकारी की पहले प्रहर की पूजा हो गई। हिरणी ने जब पत्तों की खड़खड़ाहट सुनी, तो घबरा कर ऊपर की ओर देखा और भयभीत हो कर शिकारी से बोली- मुझे मत मारो। शिकारी ने कहा कि परिवार की भूख मिटाने की वजह से वह उसे नहीं छोड़ सकता।

हिरणी ने वादा किया कि वह अपने बच्चों को अपने स्वामी को सौंप कर लौट आएगी। शिकारी के शक करने पर उसने फिर से शिकारी को यह कहते हुए अपनी बात का भरोसा करवाया कि जैसे सत्य पर ही धरती टिकी है, समुद्र मर्यादा में रहता है और झरनों से जल-धाराएं गिरा करती हैं, वैसे ही वह भी सत्य बोल रही है। क्रूर होने के बावजूद शिकारी को उस पर दया आ गई और उसने उस हिरनी को जाने दिया।

थोड़ा समय व्यतीत होने के बाद एक और हिरनी वहां पानी पीने आई। इस बार भी शिकारी जैसे ही तीर साधने लगा, वैसे ही उसके हाथ के धक्के से फिर जल और कुछ बेलपत्र नीचे शिवलिंग पर जा गिरे। इस तरह शिकारी से दूसरे प्रहर की पूजा भी हो गई।

इस हिरनी ने भी भयभीत हो कर, शिकारी से जीवनदान की याचना की लेकिन उसके अस्वीकार कर देने पर ,हिरनी ने उसे लौट आने का वचन दिया। साथ ही कहा कि जो वचन दे कर पलट जाता है, उसका अपने जीवन में संचित पुण्य नष्ट हो जाया करता है। उस शिकारी ने पहले की तरह, इस हिरनी के वचन का भी भरोसा कर उसे जाने दिया।

इसके बाद कुछ देर बात एक और हिरण वहां आया। और अब फिर धनुष पर बाण चढ़ाने से पहले की तरह शिकारी से तीसरे प्रहर की पूजा भी संपन्न हो गई। हालांकि इस हिरण ने भी अपने बच्‍चों को उनकी माता को सौंपकर लौटने की बात कही। हिरण ने कहा – मैं धन्य हूं कि मेरा यह शरीर किसी के काम आएगा, परोपकार से मेरा जीवन सफल हो जाएगा। लेकिन कृपया कर अभी मुझे जाने दो ताकि मैं अपने बच्चों को उनकी माता के हाथ में सौंप कर और उन सबको धीरज बंधा कर यहां लौट आऊं। हिरण ने श‍िकारी को वचन द‍िया – यदि वह लौटकर न आए तो उसे वह पाप लगे जो उसे लगा करता है जो सामर्थ्य रहते हुए भी दूसरे का उपकार नहीं करता।

इसी दौरान रात्रि का अंतिम प्रहर शुरू हो गया और तभी श‍िकरी ने देखा क‍ि सभी अपने परिवार सहित आ रहे हैं। उन्हें देखते ही उसने अपने धनुष पर बाण रखा और पहले की ही तरह उसकी चौथे प्रहर की भी शिव-पूजा संपन्न हो गई | अब उस शिकारी के शिव कृपा से सभी पाप भस्म हो गये इसलिए वह सोचने लगा- ये पशु धन्य हैं जो ज्ञानहीन हो कर भी अपने शरीर से परोपकार करना चाहते हैं लेकिन धिक्कार है मेरे जीवन पर जो मैं अनेक प्रकार के कुकृत्यों से अपने परिवार का पालन करता रहा।

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